Sunday, January 6, 2019

सूक्ष्म गव्य चिकित्सा भाग 2

।। श्री ।।
*सूक्ष्म गव्य चिकित्सा*
(भाग 2)

*जरूरत अविष्कार की जननी है।*

आजतक बहुत सारे अविष्कार, शोध, नयी चिजे जरूरत के अनुसार हो गई है। नये अविष्कार के लिए जरूरते बाध्य बनाते है। पुरे विश्व में ऐसा ही होता आ रहा है। जरूरत पडने पर लोग नये नये तरिके ढुंडते है और इस चक्कर में कोई ना कोई नया अविष्कार उत्पन्न होता है। आज भी हमारे जरूरत के अनुसार ही *सूक्ष्म चिकित्सा* का अविष्कार हो गया है।

औषधी मात्रा देने में और लेने में होनेवाली तकलिफे, औषधी द्रव्योंकी अनुपलब्धता, उसे खाने में आनेवाली दिक्कते, औषधी के विषारी गुणत्व, उसका शरीरपर होनेवाला बुरा असर इससे बचने के लिए सूक्ष्म चिकित्सा बहुत अच्छी पद्धती है।

चरकाचार्य कहते है, *मात्राकालाश्राया युक्ति।* यह सूत्र के अनुसार औषध की मात्रा कम करना और युक्तिपूर्वक उसका इस्तेमाल करना अधिक सयुक्तिक है। वीर्यवान एवं प्रभावी औषधी अत्यल्प मात्रा में प्रयुक्त करनेपर भी अपना प्रभाव और गुणों का त्याग नही करती, ऐसा आजतक आचार्योंका अनुभव है।

*औषधी द्रव्य कौनसी भी अवस्था में अपना स्वभाव नही छोडते* यह सूत्र महत्त्वपूर्ण है। उसे पकाया, उसका काढा बनाया, कल्क बनाया या उसे जला दिया। फिर भी उसके गुण और स्वभाव विद्यमान रहते है। द्रव को भस्म कर दिया तो भी भस्म में बहुत सारे गुणधर्म विद्यमान होते है। बल्कि उसके मनुष्य शरीर के लिए विषारीत्व कम होता है। इसलिए सुवर्ण, ताम्र, रजत आदि के भस्म बनाकर उसका इस्तेमाल औषधी द्रव के रूप मे प्राचीन काल से करते आये है।

*प्रभाव सर्वश्रेष्ठ है।*

चरकाचार्यजी कहते है,
*भूयश्र्चेषां बलाधानं कार्यं स्वरस भावनैः।*
*सुभावितं ह्यल्पमपि द्रव्यं स्यात् बहुकर्मकृत।।*
स्वरस भावनाविधी से अल्प मात्रा में दिया द्रव्य भी बहुत कार्यकारी होता है।
*अल्पस्यापि महार्थत्वं प्रभुतस्याल्पकर्मताम्।*
*कुर्यात संयोग विश्लेष कालसंस्कारयुक्तिभिः।।*
संयोग, विश्लेष, काल, संस्कार और युक्ती इनकी सहाय्यता से अल्प मात्रा में दिए हुए औषधी से भी महार्थत्व अर्थात अधिक परिणाम पाना संभव है।
इसका मतलब ये है की, द्रव को अल्प, बहुअल्प, अल्पतम करने से उसकी परिणामकता और बहुकार्यकारकत्व कम होने के बजाय बढते जाते है। द्रव को सूक्ष्म करने से उसके परिणामकारकत्व बढ जाते है और वह बहुकार्यकारी बन जाते है। सूक्ष्म करने से उसका बल और उसकी शक्ती बढती है।

*सूक्ष्मीकरण से औषधी खत्म नही होती।*
*सूक्ष्मीकरण से औषधी दीर्घकाल हीनवीर्य नही होती।*
एकबार सिद्ध की गयी औषधी से बार-बार वही औषधी से दवाई बना सकते है और उसकी उपयुक्तता मे न्यूनता नही आती।
औषधी का सेवन सरलता से किया जा सकता है।
शिशूओ, बच्चे, महिलाओं के लिए उपयुक्त है। उन्हे कटु, अम्ल, तिक्त आदि रसों का सेवन नही करना पडता।
सूक्ष्म औषधी बनाने के लिए थोडी मात्रा में मूल औषधी लेकर उसकी बडी मात्रा में औषधी बना सकते है, इसलिए औषधी का खर्च बहुत कम आने लगता है। गरीब से गरीब रुग्ण को भी यह दे सकते है।
सूक्ष्म औषधी का रोगनाशक गुण का प्रत्यक्ष अनुभव मिलता है।
औषधी कितनी भी सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम कर दी जाय उसका परिणाम, बल और वीर्य बढ जाता है।
कटु, तिक्त क्वाथ, चूर्ण, गुटीका, वटी, अर्क, आसवारिष्ट, तैल आदिं के
1. बहुप्रमाणत्व – बहुत मात्रा में लेने पडना।
2. अरुची उत्पादकत्व – मुह में जाते ही अरूची उत्पन्न होती है, बालक, महिलाएँ और कई सारे लोग इसलिए ऐसी औषधी लेने से हिचकिचाते है।
3. घृणास्पदत्व – कई सारे लोग मूत्रादिको घृणीत जैसे मानते है। इसलिए वह नही लेते है।
4. अनिष्ट परिणामकत्त्व – कई सारे पदार्थ औषधी मे इस्तेमाल किए जाते है, जिसका शरीरपर दुसरे अनिष्ट परिणाम होते है। जिसे हम साईड इफेक्ट बोलते है। ऐसी मान्यता है की, आयुर्वेद की औषधी के साईड इफेक्ट्स नही है, लेकिन वस्तुतः ऐसा नही है। अनेक सारे रसौषधी के अनेकानेक साईड इफेक्ट्स है।
*सूक्ष्मौषधी में ये सारे दोष निकल जाते है।* औषधी द्रव सिर्फ रोगनिवारण हेतू कार्यकारी होते है।
*अल्पमात्र प्रमाणत्वात् अरूचेः अप्रसंगातः। क्षिप्रं आरोग्यदायित्वात।।*
अल्पमात्रा मे लिए हुए औषधी से अरुची आदि दोष निकलकर सिर्फ वह आरोग्यदायी बन जाती है।
औषधियों का शरीर पर होने वाला कार्य मात्रा पर निर्भर नही होता। औषधी वीर्यप्रधान होती है। वीर्य तेजो वायवीय गुण है। पृथ्वी तत्त्व स्थूल होने से वीर्य का बाधक है। इसलिए स्थूल औषधी की मात्रा जादा देनी पडती है। *औषधी द्रव जितना सूक्ष्म होगा उतनी उसकी मात्रा अल्प होगी और उसका वीर्य तीव्र होगा।*
सूक्ष्म औषधी सस्ती, सुरक्षित, बलवान और लेने में आसान होती है। और सभी को अच्छी लग सकती है। आज के दीनों में *सूक्ष्म औषधीही एक सुरक्षित पर्याय है।* अनेक दुर्धर व्याधियों में वीर्यवान औषधी उपलब्ध होने से भी वह उष्ण, तीक्ष्ण, विषकल्पों के उग्र प्रभाव की होती है। उसका बुरा असर भी पड सकता है। पर ऐसी औषधी का सूक्ष्मीकरण करके उसका प्रयोग कर सकते है।
सूक्ष्म औषधी की प्रायोगिक सुरक्षितता, सौकर्य, सहजता, सुलभता और परिणामकारकता इतर औषधी से जादा है। सूक्ष्म औषधी मे स्थूल द्रव्यों की मात्रा नगण्य होने से उनके विषाक्तता का भय समाप्त हो जाता है।

सूक्ष्म औषधीयाँ विकासी याने शरीर में जाकर उसका कार्य बढाती है, फैलाती है। सूक्ष्म स्रोतोगामी होती है। शरीर के सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्रोतस मे वह सहजता से जाकर पहुंचती है।
उसे पेट में जाने की जरूरत ही नही पडती। मुख से ही शोषित होकर अपना कार्य शुरू कर देती है। अधिक मात्रा में औषधी देने से वह आमाशय में जाकर आहार के साथ मिश्र होती है। फिर उसका पाचन होने के बाद फिर रक्त के साथ शरीर में जा सकती है। जिसका पाचन नही हुआ वह बाहर निकल जाती है। बहुत सारे दवाए, आयुर्वेदिक, अँलोपॅथिक टॅबलेट्स, कॅप्सूल्स ऐसे है, जिनका पाचन नही होता। और हुआ तो भी पुरू 100 प्रतिशत औषधी शरीर में नही जाती। अन्न के साथ निचे जाकर बाहर निकल जाती है। 40 ते 60 प्रतिशत औषधी का कुछ काम ही नही होता।
आज के महंगाई के जमाने में अच्छि से अच्छि औषधी को सूक्ष्म बनाकर दे सकते है। सूक्ष्म औषधी बलवान, आशुकारी और सस्ती बनाकर जनसामान्य की सेवा में उपलब्ध करा सकते है।

*सूक्ष्म गव्यचिकित्सा* का उद्देश भी यही है। जन-जन को आरोग्य का लाभ हो। गरीब से गरीब लोगों को भी अच्छि से अच्छि औषधी मिले। *सूक्ष्म गव्यचिकित्सा* मे ये सभी औषधी देशी गाय के गव्य से ही बनाये जाए। आज कितने प्रयास करके भी सभी लोगों के पास देशी गाय का दूध, मूत्र अर्क और उसकी बनाई हुई सभी औषधीयों की उपलब्धता नही है। उसकी कोई पुरी व्यवस्था नही है। गोमूत्रार्क लेने से लोक पिछे हटते है, उनके मन में मूत्र के प्रती बचपण से घृणा उत्पन्न की गयी है। इसलिए वह लेते नही। लेने वाले उसके स्वाद से अप्रसन्न है। शहरों में सभी के पास गाय नही है। और संभालना भी असंभव है। एक खोली में बिस्तर मांडकर रहनेवाला गाय कैसे पाल सकता है। रोजी रोटी के पिछे दौडने वाले गाय कब संभालेंगे? गाय की व्यवस्था कैसी करेंगे। सभी के पास सभी चिजे नही होती। लेकिन सभी को गाय के गव्यों का फायदा पहुंचाने के लिए गव्यों का सूक्ष्मीकरण करना अनिवार्य हो गया है। क्यों की, हर रोज ताजा गोमूत्र, गोमय और दुध लेकर पंचगव्य बनाकर पिना कितने लोगों को संभव है। इसलिए पंचगव्यों का सूक्ष्मीकरण करके उसका परिणाम वही पाकर सभी लोगों तक पहुंचाना बहुत आसान है। इसलिए सूक्ष्म गव्य चिकित्सा आज महत्त्वपूर्ण हो गयी है।

*सूक्ष्म गव्य चिकित्सा* से यह लाभ मिल सकते है।
1. कम से कम मात्रा में अधिक लोगों को लाभ मिले।
2. प्रमाण मे ना के बराबर किंमत में औषध मिले।
3. अमृततुल्य गव्यों का परिणाम बढाते हुए सभी को गव्य मिले।
4. गव्यों के माध्यम से सभी को आरोग्य लाभ हो।
5. गव्यों के लिए गाय का होना अनिवार्य है। अपनी देशी गाय बचे।
6. गाय पालनेवालों को भी गव्यों से फायदा मिले।
7. गव्यों की सवीर्यतावधि बढाना।
8. गव्यों की परिणामकारकता बढाना।
9. गव्यों का बल व शक्ती और बढाना।
10 गव्यों को सभी को सहजता से लेने योग्य बनाना।
इससे
1. सभी को आरोग्य लाभ भी होगा।
2. गाय भी बचेगी और
3. पैसा भी मिलेगा।
(आगे का भाग आगे भाग 3 में)

*ब्रह्मर्षि अधिक देशमुख*
(विद्यावाचस्पती)
*ऋषीगुरूपीठम् ट्रस्ट, पुणे*
*सद्गुरू नॅचरल हेल्थ सेंटर, पुणे* (महाराष्ट्र)
9850666581

सूक्ष्म गव्य चिकित्सा भाग 1

।। श्री ।।
*सूक्ष्म गव्य चिकित्सा*
(भाग 1)

गव्य चिकित्सा को बहुत सारे लोग जानते ही है। गव्य से बहुत सारे उत्पाद भी बनाते है, ज्यो की मानवी जीवन के लिए बहुत फायदेमंद और जीवनसुधारू शाबित हुए है।

मुख्य गव्य तीन प्रकार के है।
*1. दुग्ध*
*2. गोमूत्र*
*3. गोमय*
इन तिन्होसे उपप्रकार होते है, और कुल मिलाकर 15 गव्य मिलते है।
*1. दुग्धपंचक*
*2. मूत्रपंचक*
*3. गोमयपंचक*
ऐसे 15 गव्य बनते है। एकेक गव्य से अनेकविध वस्तुओंकी निर्मिती हो सकती है। गव्य का मानवी जीवन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। उससे आरोग्यपूर्ण जीवन भी मिलता है और जो कुछ शरीर में गडबडी उभारी जाती है, जिसे बिमारी कहते है, वह भी बिनाऔषधी दुरुस्त होती है। गव्य मानवी शरीर के कौशिकाओं के लिए बहुत उपयुक्त है, कोशिका को ज्यो कुछ लगता है, उसकी आपुर्ती गव्य के द्वारा की जाती है। इसलिए मानवी जीवन के लिए गव्य बहुत फायदेमंद शाबित हुए है।

संस्कारित द्रव्यों की सहाय्यता से रुग्ण व्याधीमुक्त होता है। हम हमारा अन्न भी संस्कार करके ही खाते है। चरकाचार्य के अनुसार जिस द्व्य का उपयोग आरोग्यप्राप्ती के लिए किया जाता है वो द्रव्य औषधी है। इस मत के अनुसार हम ज्यो अन्नग्रहन करते है, वो भी औषधी बन सकती है। सबसे जादा औषधी का कार्य गव्य करते है। उसमे दुध से लेकर घृत औऱ गोमूत्र तक अनेक गव्योंका समावेश है।

*वैद्यो व्याधिं हरेद्येन तद् द्रव्यं प्रोक्तमौषम्।* (अत्रि संहिता)
*तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय कल्पते।* (चरक)
ओष याने कार्यकारी बल। द्रव्य के कार्यकारी बस से आरोग्य प्राप्त होता है। वैद्य जिससे व्याधि का हरण करता है, उसे औषधी कहते है।

औषधी के दो प्रकार होते है।
*1. स्थूल औषधी*
*2. सूक्ष्म औषधी*

स्थूल औषधी हम अर्क, घणवटी, काढा, कल्क, फाट, आसव, चूर्ण, टॅबलेट, कॅप्सूल, सिरप ऐसे नानाविध रूपों में देखते है। स्थूल औषधी पेट में जाती है तब उसका पाचन होना आवश्यक होता है। जिसका पाचन होता है उसका द्राव रक्त में घुलमिलकर बाद मे स्रोतस के माध्यम से शरीरभर जाता है। जिसका पाचन नही होता वह मल के रूप में फ्लश हो जाता है। इस के लिए बहुत समय लगता है। स्थूल औषधी का यही एकमेव मार्ग है, पेट में जाकर पाचन होकर शरीर मे जाना। दुसरा मार्ग इंजेक्शन का है। जो डायरेक्ट रक्त मे छोड दिया जाता है।

सूक्ष्म औषधी का तरिका भिन्न है। सूक्ष्म औषधी जीभ और नासिका के माध्यम सें तुरंत शरीर के स्रोतस मे घुलमिल जाती है। इसका परिणाम बहुत जल्दी होता है। जिस में नासिका का उपयोग किया जाता है, उसे *यज्ञ चिकित्सा* कहते है, और जीभ का उपयोग जिस में किया जाता है, उसे *सूक्ष्म गव्य चिकित्सा* कह सकते है।

सूक्ष्मौषधी का उपयोग होमिओपॅथी में भी किया गया है। और सूक्ष्म आयुर्वद में भी किया जाता है। दोनों की थोडी-थोडी भिन्न भिन्न प्रक्रिया है। अपनी हमारी *सूक्ष्म गव्य चिकित्सा* की प्रक्रिया और प्रणाली और थोडीसी अलग है। इस में जीभ इस ज्ञानेंद्रिय का इस्तेमाल किया जाता है। इस में औषध की मात्रा भी बहुत अल्प मात्रा में लगती है। इस के और फायदे हम आगे देखेंगे।

*औषधी गुण*
*अल्पमात्रं महावेगं बहुदोषहरं सुखम्।*
*लघुपाकं सुखास्वादं प्रीणनम् व्याधिनाशन्।।*
*अनपाय्यविपन्नं च नातिग्लानिकरं च यत्।*
*गंधवर्णरसोपेतं विद्यन्मात्रावदौषधम्।।* (च.सि. 6.12.13)

*1. अल्पमात्र –* औषधी की मात्रा हमेशा अल्प होनी चाहिए।
*2. महावेग –* औषधी त्वरित कार्य करनेवाली होनी चाहिए। थोडीसी ही लेने से उसका तुरंग परिणाम दिखना चेहीए। औषधी महिनो न् महिने लेते रहे और परिणाम की राह देखते रहे, ऐसा नही होना चाहिए। औषधी लेते ही उस क्षण से उसका परिणाम दिखना चाहिए।
*3. बहुदोषहर –* यदी एकही औषधी का सेवन किया होगा फिर भी वह बहुत दोषो को दूर करनेवाली होनी चाहिए।
*4. सुखम् –* औषधी प्राशन सुखकर होनी चाहिए और औषधी लेने के बाद भी कुछ पिडा न होनी चाहिए। औषधी का सभी परिणाम सुखद होना चाहिए।
*5. लघुपाक –* औषधी शरीर में जाने से वह पाचनसुलभ होनी चाहिए। (सुक्ष्मौषधी का पाचन का कोई संबंध ही नही है। पाचन के सिवा वह रक्त में औऱ शरीर के विभिन्न स्रोतस में तुरंत घुलमिल जाती है।)
*6. सुखास्वाद -* औषधी का स्वाद सुखकर होना चाहिए। वह रुचीकर भी होनी चाहिए। औषध लेते समय घृणा, नॉशिआ, कटुता, मुंह फेर करना नही होना चाहिए।
*7. प्रीणन -* औषधी लेतेसमय और औषध लेने के बाद प्रसन्नता महसूस होनी चाहिए।
*8. व्याधिनाशक -* जो औषधी के सेवन किया है, उस औषधी व्याधी दूर करने के प्रयोजन से ली जाती है। तो वह औषधी रोग को दूर करने में समर्थ होनी चाहिए। उसमें रोगनिवारक शक्ती होनी चाहिए।
*9. अनपाय्य -* औषधी से दुसरा कौनसा भी गंभिर विकार न होना चाहिए। आज औषधी खाकर लोग मरते है। औषध खाकर मरनेवालों का पुरे विश्व में चौथा नंबर है। औषधी विकाररहित होनी चाहिए।
*10. अविपन्न -* औषधी में कौनसी भी त्रुटी, या भूल-चूक न होनी चाहिए। पूर्णतः निर्दोष होनी चाहिए।
*11. नातिग्लानिकरं -* औषध खाने के बाद ग्लानी या निंद नही आना चाहिए।
*12. गंधवर्णरसोपेतं -* इष्ट गंध, वर्ण और रसयुक्त होना चाहिए।

ऐसी औषधी लेते ही शरीर के स्रोतस में सहजता से घुलमिल होना जाहिए। आयुर्वेदानुसार शरीर मे 13 स्रोतस है। उसकी थोडी चानकारी लेंगे।

*स्रोतस स्वरूप*
आयुर्वेदज्ञो ने स्रोतस के निम्न स्वरुप नाम और कार्य के अनुसार स्वीकृत किये हैं
१. प्राणवह स्रोतस
स्वरुप - नाडी 
कार्य - श्वास, प्रश्वास
दोष संबंध - वायु

२. उदकवह स्रोतस
स्वरुप - रसायनी
कार्य - उदक संवहन
दोष संबंध - कफ

३. अन्नवह स्रोतस
स्वरुप - मार्ग
कार्य - अन्न ग्रहण
दोष संबंध - पित्त

४. रसवह स्रोतस
स्वरुप - रसवाहिनी
कार्य - रससंवहन
दोष संबंध - कफ

५. रक्तवह स्रोतस
स्वरुप - ग्रंथि
कार्य - रक्तसंवहन
दोष संबंध – पित्त

६. मांसवह स्रोतस
कार्य - मॉस संवहन
दोष संबंध – कफ

७. मेदोवह स्रोतस
कार्य - मेदसंवहन
दोष संबंध – कफ

८. अस्थिवह स्रोतस
दोष संबंध – वायु

९. मज्जावह स्रोतस
दोष संबंध – कफ

१०. शुक्रवह स्रोतस
स्वरुप - पंथान
कार्य - शुक्र संवहन
दोष संबंध – कफ

११. मूत्रवह स्रोतस
स्वरुप - मार्ग
कार्य - मूत्र संवहन
दोष संबंध – कफ

१२. पुरीषवह स्रोतस
स्वरुप - मार्ग
कार्य - पुरीष संवहन
दोष – वायु

१३. स्वेदवह स्रोतस
स्वरुप - शारीर छिद्र
कार्य - स्वेद संवहन
दोष संबंध – पित्त

मूल स्रोतस 13 है, लेकिन
*आचार्य सुश्रुत ने स्तन्यवह स्रोतस और आर्तववह स्रोतस का अतिरिक्त वर्णन किया है*

१४. स्तन्यवह स्रोतस
स्वरुप - शरीर छिद्र
कार्य - स्तन्य संवहन
दोष संबंध - कफ

१५. आर्तववह स्रोतस
स्वरुप - मार्ग
कार्य - आर्तव संवहन
दोष - पित्त।

*(यस्य) विवरणे (शक्तिः स) सूक्ष्मः।*
जो द्रव्य शरीर में गहराई तक पहुंचता है वह सूक्ष्म द्रव है।
*सूक्ष्मस्तु सौक्ष्म्यात सूक्ष्मेषु स्रोतः स्वनुसरः स्मृतः।*
अत्यंत छोटे छोटे अवकाश में घुसने की द्रव्य की स्वयंशक्ती है वह सूक्ष्म गुण है।
*यत् द्रव्यं दैहस्य शरीरस्य सूक्ष्म छिद्रेषु रोमकूपप्रभृतिषु विशेत् प्रवेशं करोति तत् सूक्ष्मम् उच्चते।*
*सूक्ष्मो गुण विशेषः। स्रोतोनुसरणशीलत्वात्।* (शा.सं.प्.ख.4.18)
जो द्रव्य शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म स्रोतो में शीघ्रता से प्रवेश करके अपना कार्य करता है उसे सूक्ष्म कहते है।
(आगे का भाग 2 में)

ब्रह्मर्षि अधिक देशमुख
ऋषीगुरूपीठम् ट्रस्ट, पुणे
9850666581
सद्गुरू नॅचरल हेल्थ सेंटर, पुणे (महाराष्ट्र)
9594301100

Tuesday, December 25, 2018

एक किसान का सरकार को सुझाव

एक किसान का सरकार को सुझाव

गौभक्त कान सिंह जी राजास्थान के सबसे बड़े किसानों में से एक है । कानसिंह जी सीकर में जोर की ढाणी में गौ आधारित  खेती , ऋषि कृषि का सफल अभ्यास करते है  ,जहा विदेशी पर्यटक भी आते है । कान सिंह जी के अनुसार किसान को बचाने के लिए 3 काम करे सरकार-

1. यूरिया dap बंद करके उसकी सब्सिडी का पैसा किसानों के एकाउंट में डलवा दे ( 10 से 20 हजार प्रति किसान हर साल) ,

2. गोचर भूमि की मालिक गौमाता को बना दे

3. दूध की किम्मत फैट से नही बल्कि उसकी गुणवत्ता से करदे सरकार ।

इन 3 नियमो का पालन करने से सरकार किसानों का लाभ कर सकती है । जिस दिन किसान गौ माता को अपने घर ले आएगा , जो 33 कोटि देवताओ को निवास है  ,उस दिन किसान का उद्धार हो जाएगा । गौमाता का गोवर सूक्ष्म जीवाणुओ को कई गुना बढ़ता है, जो पोधो को खुराक देते है । एक गाय से किसान 30 एकड़ में बिना लागत ( जीरो बजट फार्मिंग, ऋषि कृषि) सेे बम्पर खेती कर सकता । इससे किसानों का पैसा ( यूरिया आदि का) विदेश में नही जाएगा  ।


Saturday, December 22, 2018

बीमारी इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है? और गौमूत्र से क्यों ठीक होती है?

बीमारी इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है? और गौमूत्र से क्यों ठीक होती है? संक्षिप्त विवरण देखें |

Ebook -Cow Dung -A Down-to-Earth solution to Global Warming and Climate Change - Book by Dr Sahadeva Dasa (CA,AICWA,Phd.)


Cow Dung -A Down-to-Earth solution to Global Warming and Climate Change - Book by Dr Sahadeva Dasa (CA,AICWA,Phd.)

Dr Sahadeva Dasa graduated in commerce from St.Xaviers College, Kolkata and then went on to complete his CA (Chartered Accountancy) and ICWA (Cost and works Accountancy) with national ranks.

His earlier book, Oil – A Global Crisis and Its Solutions (oilCrisisSolutions.com) has been aclaimed internationally.

Find the ebook in below link:

http://www.drdasa.com/uploads/5/3/6/3/5363764/cow_dung_a_down_to_earth_solution_to_global_warming_.pdf



Thursday, December 13, 2018

Royal ploughing ceremony


आज भी थाईलैंड आदि देशों में रॉयल पलोहींग उत्सव मनाया जाता है , जब फसल काटने का समय आता है । जैसे रामायण में भी सीता के जन्म की कथा में आता है कि माता सीता का जन्म जमीन से हुआ जब राजा दशरथ हल जोत रहे थे ।
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Royal_Ploughing_Ceremony

7नवंबर1966 को गौभक्तो पर हमले का विवरण पत्रकार द्वारा

7नवंबर1966 को गौभक्तो पर हमला
https://twitter.com/oldhandhyd/status/1058626070612664320?s=09